Wednesday, 1 March 2017


इक गज़ल




हवस की मोहब्बतें घूमती मुझे सड़कों पे मिलती है
हीरे-मोती की ख्वाहिशें सजी पलकों पे मिलती है

मैं पालूँ जमाने का हर एश-ओ-आराम फिर भी
इस प्यासे को नदी , माँ तेरे कदमों में मिलती है |

गानें दुनिया जहान के चलते हैं अब मगर
वो राग नहीं जो , तेरी लौरी के तराने में मिलती है |

बेशक है मखमली बिस्तर मेरा सोने को
सुकून की नींद  , फिर भी तेरे थापों से मिलती है |

मेरी औकात पर यूँ जब कभी चाँटा जो पड़ जाए
मेरी चोट की पीड़ा , तेरी आहों में मिलती है |

मत खोना ए दोस्त इस खुदा को तुम कभी
हर शख्स मिल जाता , फिर माँ ना जमाने में मिलती है ||

-कान्हा'नूतन'

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