इक गज़ल
हवस की मोहब्बतें घूमती मुझे सड़कों पे मिलती है
हीरे-मोती की ख्वाहिशें सजी पलकों पे मिलती है
हीरे-मोती की ख्वाहिशें सजी पलकों पे मिलती है
मैं पालूँ जमाने का हर एश-ओ-आराम फिर भी
इस प्यासे को नदी , माँ तेरे कदमों में मिलती है |
गानें दुनिया जहान के चलते हैं अब मगर
वो राग नहीं जो , तेरी लौरी के तराने में मिलती है |
बेशक है मखमली बिस्तर मेरा सोने को
सुकून की नींद , फिर भी तेरे थापों से मिलती है |
मेरी औकात पर यूँ जब कभी चाँटा जो पड़ जाए
मेरी चोट की पीड़ा , तेरी आहों में मिलती है |
मत खोना ए दोस्त इस खुदा को तुम कभी
हर शख्स मिल जाता , फिर माँ ना जमाने में मिलती है ||
-कान्हा'नूतन'

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